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I have been selected in IBM. I was struggling for my career settlement after completing MCA but not getting any job. After meeting Sh Gopal Raju sir my life now after 6 years is running smoothly.His puja and stone combination gave be positive results.
*Sanjeev, Saharanpur
राजू भैया के मार्गदर्शन से घर में शांति व पैसा स्थाई रूप से रहने लगा । नौकरी में भी लाभ हुआ । बेटे को विशेष रूप से अच्छा लग रहा है और वह आगे प्रगति कर रहा है ।
*पूनम शर्मा, वैशाली
मैं आज से करीब १२ साल पहले श्री गोपाल राजू जी से मिला था । तब उन्होंने मुझसे कहा था कि आपकी सरकारी नौकरी लगेगी और आप एक बड़ी गाड़ी में आएंगे । तब मेरी पत्नी हंसने लगीं तो राजू जी ने कहा था कि आप हंस रही हैं पर वह गाड़ी इतनी बड़ी होगी कि मेरी गली में भी नहीं आ पायेगी । आज मैं श्री गोपाल राजू जी के आशीर्वाद तथा मालिक की कृपा से झारखण्ड न्यायिक सेवा में सिविल जज के पद पर पदासीन हूँ ।
*विपिन गौतम, झारखण्ड
Met Gopal Raju ji & I am really very happy because he is not a greedy or money minded person. He showed that way to me that very poor person can also do his easy remedies. I am very thankful to him. I will like to meet him in future also.
*Rekha Nail, Barwaha, Indore
I was suffering with severe depression problem. After puja and specific combination of two gemstone I am feeling 80 % better.
*Er. Ashish saini, Banglore
Kakaneeli+Ziron analyzed and given by Sh Gopal Raju has proved miraculous. I have involved in three more contracts after using this unique ring of three stones.
*Meharban Ali, Roorkee
I am presently working as an Asstt. Engineer in PITCUL. Mr. Raju's guidance and remedial measures helped me in choosing the right and good job. All credit goes to his dedicated and intellectual services.
*Er. Himanshu Baliyan, Dehradun



काम, सहवास और श्रेष्ठ संतान

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मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)

 

काम, सहवास और श्रेष्ठ संतान

       भारतवर्ष में जैसे आचार्य वात्सायन मुनि का कामसूत्रकामशास्त्र का प्रसिद्ध ग्रंथ है, उसी प्रकार यूरोप तथा पश्चिमी देशों में कामशास्त्र सम्बन्धी हैवेलक एलिस का साइंस ऑफ सैक्स(Science of Sex) ग्रंथ कुल सात भागों में चचिर्त है। रति, काम, सम्भोग आदि नाम आते ही सामान्य मनुष्य के मन में अश्लीलता का चित्रण होने लगता है। अज्ञानतावश ऐसी भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक भी है। काम विज्ञान के तत्वों का बोध हुए बिना वयक्ति पशुओं के समान विहार करता है। पृथ्वी पर जितने भी जीव जन्तु हैं उनमें सूअर तथा मनुष्य को छोड़कर प्रत्येक के सहवास का एक निर्धारित समय है। इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि काम के विषय में व्यक्ति जानवर से भी बदत्तर है। काम, सम्भोग, रति आदि का ज्ञान अनुचित विषय भोग को रोकने और उचित काम का नियम पूर्वक उपयोग करने के लिए है। रति क्रिया में स्त्री-पुरुष को जो सुखानुभूति प्रतीत होती है उसका यथोचित रुप से, अश्लील तथा कामुकता की भावना से अलग आस्वादन करना ही कामशास्त्र का विषय है। प्रेम सहित स्त्री सहवास गृहस्थ धर्म का मूल मंत्र है। शास्त्रकार सहवास के जो नियम बना गए थे, आज हम पाते हैं कि वह पूर्णतः वैज्ञानिक हैं। यदि संयम से इनका पालन किया जाए तो व्यक्ति दीर्घायु, कान्तिवान, बौद्धिक होने के साथ-साथ स्वथ्य, सुंदर तथा परोपकारी संतान को भी जन्म देता है। मैथुन का अर्थ वस्तुतः संतानोपत्ति ही है। यह नैतिक और धर्म परायण भी है।

     लाखों-करोड़ों प्रत्यक्ष प्रमाणों से यह बात अनुभव में आ चुकी है कि संयम, उचित समय, सात्विक मनोभाव आदि से यदि स्त्री पुरुष रति क्रिया करें तो उसी भावना के अनुकूल कान्तिवान, बुद्धिमान अथवा कहें कि सर्वगुण संपन्न संतान की प्राप्ति होती है। कामुकता, असमय और अश्लील कुविचारों तथा तामसिक और पाश्चिक भावनाओं को लेकर किए गए सहवास से मूर्ख, विकृत, अस्वस्थ, कामी, कुलकलंकी आदि सन्तान ही जन्म लेती है।

     श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करने के लिए स्त्री-सहवास के सम्बन्ध में काल, ऋतु, दिन, तिथि, समय तथा नक्षत्र आदि का ध्यान रखना काम तथा रवि शास्त्र के अनेक मूल ग्रंथों में मिलता है। भारतीय संस्कृति में पूर्णिमा, अमावस्या, चतुर्दशी तथा कृष्ण और शुक्ल पक्ष दोनों की अष्टमी आदि को सहवास वर्जितमाना गया है। रति-सहवास के नियम ऐसे ही बनाए गए हैं, इनके पीछे ठोस वैज्ञानिक तथा विवेचनात्मक आधार छिपा है। पूर्णिमा और अमावस्या तथा अष्टमी को सूर्य, चन्द्र तथा पृथ्वी एक रेखीय स्थिति में आ जाते हैं। गुरुत्वाकर्षण के कारण उनका परस्पर आकर्षण इस स्थिति में अन्य दिनों की तुलना में अधिक हो जाता है। सौर मण्डल की इस स्थिति के कारण व्यक्ति की उत्तेजना, रक्तचाप सामान्य नहीं रहता। दूसरी ओर सूर्य और चन्द्रमा की स्थितियों में, जबकि एक दूसरे से वह समकोण बना रहे होते हैं, गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण भयंकर संघर्षण हो रहा होता है। इन स्थितियों में जल प्रधान होने के कारण हमारा शरीर रस ठीक उस प्रकार से प्रभावित हो रहा होता है जैसे की समुद्र। विभिन्न तिथियों में ज्वार-भाटे के रुप में समुद्र की हलचल सर्वविदित है ही। इसी कारण इन तिथियों में सहवास वर्जित बताया गया है।

     दिन में गर्भाधान के लिए की गयी रति-क्रीड़ा सर्वधा निषेध है। इस समय की संतान अल्पजीवि, रोगी, दुराचारी और अधम होती है। प्रातः और सांध्य काल में की गयी रति क्रिया विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त में उत्पन्न काम वेग विनाश का कारण सिद्ध होता है।

     कामशास्त्र के आचायरें का मतह ै कि रात्रि के प्रथम प्रहर की संतान अल्पजीति होती है। द्वितीय प्रहर से दरिद्र पुत्र तथा अभागी कन्या पैदा होती है। तृतीय प्रहर के मैथुन से निस्तेज एवं दास वृत्ति का पुत्र या क्रोधी कन्या उत्पन्न होती है। रात्रि के चतुर्थ प्रहर की संतान स्वस्थ, बुद्धिमान, आस्थावान, धर्मपरायण तथा आज्ञाकारी होती है।

पुत्र अथवा पुत्री कब उत्पन्न होते हैं : -

     अनेक विद्वानों के मतानुसार तथा सर्वाधिक चर्चित कामशास्त्र के ग्रथों में भी स्पष्ट लिखा है कि यदि संयम और शास्त्रोक्त नियमानुसार गर्भाधान किया जाता है तो मनवांछित संतान पैदा हो सकती है। जीवशास्त्रियों के अनुसार कुछ मत निम्न प्रकार से हैं।

1. हिपोक्रेट्स का मतह ै कि स्त्री के डिम्बकीट बलवान होने पर पुत्री/स्त्री और पुरुष के शुक्रकीट बलवान होने पर पुत्र उत्पन्न होता है।

2. डॉ मान्सथ्यूरी का कथन है कि रजस्वला होने पर स्त्री के रज में बहुत अधिक चैतन्यता होती है और वह उत्तरोत्तर घटती जाती है, इसलिए ऋतुस्नान के प्रारम्भिक दिनों में यदि गर्भाधान किया जाता है तो कन्या की और बाद के दिनों में पुत्र की सम्भावना अधिक होती है।

3. डॉ पी.एच.सिक्ट के अनुसार स्त्री-पुरुष के दाहिने अंग प्रभाव से पुत्र तथा बाएं अंगों से कन्या उत्पन्न होती है। स्त्री-पुरुष के बाएं अंडकोषों में कन्या तथा दाएं में पुत्र उपार्जन की शक्ति होती है।

4. डॉ लियोपोल्ड का मत है कि जिस स्त्री के मूत्र में शकर की मात्रा अधिक होती है उनको पुत्रियों और जहॉ यह कम परिमाण में होती है वहॉ पुत्र होने की अधिक सम्भावना होती है।

5. डॉ एलवर्ट ह्यूम का मत है कि रजोदर्शन के आरम्भिक काल में स्त्री की कामेच्छा प्रबल होती है इसलिए स्त्री तत्व जागृत होकर वंशवृद्धि का प्रयास करता है अर्थात रजस्वला होने के शीघ्र बाद रति करने पर पुत्री होना लगभग निश्चित होता है। इसके बाद जितना विलम्ब होता है पुत्र की सम्भावना बढ़ जाती है।

6. डॉ हाफकर का मत है कि माता से पिता की आयु अधिक होने पर एवं उसका वीर्य परिपुष्ट होने पर पुत्र पैदा होता है।

7. डॉ फ्रैंकलिन का मत है कि गर्भ-धारण के आरम्भिक दिनों में बलवर्धक भोजन से पुत्र तथा हल्का पदार्थ लेने पर पुत्री उत्पन्न होती है।

8. अनेक लोगों की मान्यता है कि ब्रम्हचर्य के बाद स्वस्थ रति से पुत्र उत्पन्न होता है।

9. चिरकालीन वियोग के पश्चात् एवं शरद ऋतु में सहवास करने से पुत्र का जन्म होता है।

10.    आचार्य सुश्रुत का कथन है कि रजोदर्शन से ऋतु स्नान तक की रात्रियॉ त्याज्य हैं। इनके अतिरिक्त रजोदर्शन से गिनी हुई समराशियॉ 4, 6, 8, 10 आदि में गर्भाधान करने से पुत्र और 5, 7, 9 आदि में गर्भाधान करने से पुत्री पैदा होती है।

11.    महर्षि वाग्भट्ट का मत है कि स्त्री-पुरुष के दाएं अंगों की प्रधानता से पुत्र तथा बांए से पुत्रियॉ उत्पन्न होती है।

12.    चरक का कथन है कि वीर्य की अधिकता से पुत्र और रज की प्रधानता से पुत्री पैदा होती है।

13.    पं.कोक का कथन है कि अत्यधिक कामुक और मैथुन करने वालों के कन्याएं अधिक होती हैं।

14.    यदि शीर्घ पतन की समस्या है तो पुत्रियों की अधिक सम्भावना होती है।

15.    स्वरं योग के आचार्यों का मानना है कि पुरुष की इड़ा नाड़ी अर्थात् दायां स्वर चलते समय का गर्भ पुत्र होता है। पुत्र तथा पुत्री कामना के लिए किए गए गर्भाधान में स्वर शास्त्र का बहुत महत्व है। अतः पुत्र की इच्छा रखने वाले निम्न सारणी में से कोई सी रात्रि का बायां स्वर चलना चाहिए। साथ ही साथ पृथ्वी और जल तत्व का भी संयोग हो।

 ऋतु स्राव से लेकर

चौथी रात्रि तक का गर्भ

अल्पायु, दरिद्र पुत्र

 ’’

छठी         ’’

साधारण आयु वाला पुत्र

 ’’

आठवीं       ’’

ऐश्वर्यवान पुत्र

 ’’

दसवीं        ’’

चतुर पुत्र

 ’’

बारहवीं       ’’

उत्तम पुत्र

 ’’

चौदहवीं      ’’

उत्तम पुत्र

 ’’

सोलहवीं      ’’

सर्वगुण सम्पन्न पुत्र

 

इसी प्रकार कन्या के लिए गर्भाधान का वह समय शुभ है जब पुरुष का बांया स्वर और स्त्री का दांया स्वर चल रहा हो तथा सहवास के समय जल तत्व अथवा पृथ्वी तत्व का संयोग हो। इसके लिए रातों का फल निम्न सारणी से स्पष्ट है -

 ऋतु स्राव से लेकर

पांचवी रात्रि तक का गर्भ

स्वथ्य कन्या

 ’’

सातवीं         ’’

बन्धा कन्या

 ’’

नवीं       ’’

ऐश्वर्यवान कन्या

 ’’

ग्यारहवीं        ’’

दुष्चरित्र कन्या

 ’’

तेरहवीं       ’’

वर्णसंकर वाली कन्या

 ’’

पंद्रहवीं      ’’

सौभाग्यशाली कन्या

 

रति क्रीड़ा में त्याज्य काल : -

  रजो दर्शन की चार रात्रियॉ, कोई पर्व जैसे अमावस्या, पूर्णिमा, सातवीं, ग्यारहवीं, तथा चोदहवीं रात्रि त्याज्य है।

  सोलहवीं रात्रि के गर्भाधान से उत्तम संतान का जन्म होता है।

दिन : -

  ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवार, गुरुवार तथा शुक्रवार की रातें गर्भाधान के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

  एक उर्दू ग्रंथ में लिखा है कि सोमवार का मालिक चन्द्रमा है और मुश्तरी अर्थात् बुध वजीर है। इस रात्रि में मिलन से प्रखर बुद्धि संतान पैदा होती है। यह समय मॉ के लिए सुखदायी सिद्ध होता है।

  गुरुवार का मालिक मर्रीख अर्थात गुरु है और वज़ीर सूर्य है। यह समय गर्भाधान के लिए शुभ है।

  शुक्रवार का मालिक जोहरा अर्थात् जोहरा अर्थात शुक्र है और वज़ीर चन्द्र। इस रात्रि का सहवास अति उत्तम संतान को जन्म देता है।

  मंगलवार, बुधवार, शनिवार और रविवार रतिक्रिया के लिए त्याज्य दिन कहे गए हैं।

शुभ नक्षत्र : -

  हस्त, श्रवण, पुनर्वसु तथा मृगशिरा गर्भाधान के लिए शुभ नक्षत्र हैं।

अशुभ नक्षत्र : -

  ज्येष्ठा, मूल, मघा, अश्लेषा, रेवतीर, कृतिका, अश्विनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रों में रति क्रीड़ा सर्वथा वर्जित है। इस समय का गर्भाधान त्याज्य है।

शुभ लग्न : -

  वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनु तथा मीन लग्नों में गर्भाधान होना शुभ है। अन्य लग्न इसके लिए त्याज्य हैं।

गर्भाधान के लिए पूर्णतया त्याज्य : -

  तीन प्रकार के गण्डान्त, निधन तारा (सातवां), जन्मर्ज्ञ, अश्विनी, भरणी, मघा, मूल तथा रेवती नक्षत्र, ग्रहण काल, पात, वैधृति, श्राद्ध तथा श्राद्ध का पूर्व दिन, परिधि का पूर्वार्ध समय, दिन, सध्याकाल, भद्रा तिथि, उत्पात से हत नक्षत्र, जन्म राशि से अष्टम लग्न, पापयुक्त लग्न, पती तथा पत्नी का चन्द्र तारा अशुद्धि, संक्राहिहहन्त और दोनों पक्षों की 8, 14, 15, 30 तिथियॉ गर्भधारण के लिए मुहूर्त चिन्तामणि, मुहूर्त दीपक आदि ग्रंथों में विशेष रुप से वर्जित कहे गए हैं।

  कामान्ध व्यक्ति के लिए यह लेख व्यर्थ का सिद्ध होगा। परन्तु यदि अपने बुद्धि-विवके से कोई रति क्रिया और सन्तानोत्पत्ति के यम, नियम और मुहूर्त आदि का पालन करता है तो उसके लिए यह सब वरदान सिद्ध होंगे।  वह स्वर्गीय सुख भोगेगा।

 

मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)

(राजपत्रित अधिकारी) अ.प्रा.

30, सिविल लाईन्स

रूड़की 247667 (उ.ख.)

www.gopalrajuarticles.webs.com

 


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