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*पूनम शर्मा, वैशाली



शिवलिंग कल्याणमय है (Shivling)

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शिवलिंग कल्याणमय है


     भगवान शिव परम कल्याणमय हैं। उनके स्वरूप में, लीला में तथा साधन में सर्वत्र परम कल्याणकारी कल्याण ही भरा है। वेद, पुराण आदि के अध्ययन से यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि सृष्टि के बनाने ,बढ़ाने और विनाश करने वाले त्रिदेव अर्थात बह्मा, विष्णु और महेश ही हैं। शिव क्या हैं, उनकी शक्ति कैसी है, संसार का सर्वनाश अथवा अमिट कल्याण करने में वह कहाँ तक समर्थ हैं, शिवलिंग की विलक्षणता के सुफल आदि का विवेचन कल्याण से उद्धत रूपरेखा में यहाँ पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

    शास्त्रों में शिव के अनेक नाम मिलते हैं, यह सब उनके गुण कर्मादि के अनुसार निर्दिष्ट किए गए हैं। प्रलयकारी, भयकारी, महाक्रोधी अथवा संहारक गुण को देखते हुए उन्हें रुद्र नाम से चरितार्थ किया गया है। ऋगवेद, यजुर्वेद तथा अर्थवेद में शिव के ईश, ईश्वर, ईशान, रुद्र, कपर्दी, शिवकण्ठ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान आदि नाम निर्दिष्ट किए गए है। अकेले ऋग्वेद की 60-70 ऋचाओं में शिव के नाम, काम और स्वरूप आदि का वर्णन मिलता है। वेदानुसार क्रोधित शिव को शान्त करने के लिए शतरुद्रका स्वतन्त्र विधान है अथर्वेद में इन्हें सहस्त्र चक्षु, तिगमायुध, वज्रायुध और विधुच्छाक्ति आदि कहा गया है। सामवेद में इन्हें अग्नि रूप कहा गया है।

    कैवल्य, अथर्व, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर और नारायण आदि उपनिषदों में तथा आक्ष्वालायनादि गृहृयसूत्रों में इन्हें न्न्यम्बक, त्रिलोचन, त्रिपुरहन्ता,ताण्डनर्तक, अष्टमूर्ति  पशुपति, औषधविधिज्ञ, आरोग्यकारक, वंशवर्धक और नीलकंठ आदि कहा गया है। शिव, वामन और स्कन्द आदि पुराणों में वाल्मीकीय रामायण, महाभारत और कुमारसम्भव आदि अनेक ग्रंथों में उनके लोकोत्तर गुणों का वर्णन विस्तार से देखा जा सकता है।

    शिव अपने सेवकों पर न तो कभी क्रोध करते हैं और न उनकी हिसां। वह सदैव मंगलकर और कृपालु रहते हैं। इससे ही शिव का नाम सार्थक होता है। आबालवृद्ध को आरोग्य रखने, पशुओं तक को स्वस्थ करने और प्रत्येक प्रकार की महौषधियों का ज्ञान होने के कारण आप को वैद्यनाथ कहा गया। धन-पुत्र और सुख-सौभाग्य आदि देने के कारण आप सदाशिव कहलाए। शीघ्र ही भक्तों पर प्रसन्न होने के कारण आशुतोष कहे गए।  इन सबसे ऊपर आप  सर्वभूतेश कहलाए

अर्थात् सर्वेश और सर्वशक्तिमान। सर्वभूतेश का अर्थ है पंचमहाभूत अर्थात् पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश। वह इनके अधिपति भी कहलाए। अर्थात् यथारूचि इन पंचमहाभूतों से कार्य करवाने वाले। यह सर्वविदित है कि संसार और उसका प्रत्येक प्राणी और पदार्थ पंचमहाभूतों से ही प्रकट होता है और यह सब निहित है भूतेश्वर की इच्छा पर। पाठक स्वयं अनुमान लगाएं इस महाशक्ति का।

    यथार्थ निवृति मार्ग पर अग्रसर होने के लिए शिव के विभिन्न नामों के साथ-साथ लिंगोपासना का विशेष महत्त्व शास्त्रों में मिलता है लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिन्ह अथवा लक्षण हैं। देव चिन्ह के अर्थ में लिंग शब्द शिवजी के ही लिंग के लिए आता है। अन्य प्रतिमाओं को मूर्ति कहा जाता है। क्योंकि यहाँ ध्यान मूर्ति के अनुरूप ही होता है। परन्तु वास्तव में लिंग में आकार या रुपक उल्लेखन नहीं होता है यह चिन्ह मात्र में है और चिन्ह भी पुरूष की जननेन्द्रिय का सा है। पुराणानुसार ''लयनालिंगमुच्यते'' कहा गया है अर्थात् लय या प्रलय से लिंग कहते प्रलय की अग्नि में सब कुछ भस्म होकर शिवलिंग में समा जाता है। वेद-शास्त्रादि भी लिंग में लीन हो जाते हैं फिर सृष्टि के आदि में सबकुछ लिंग से ही प्रकट होता है। अतः लय से ही लिंग शब्द का उद्भव ठीक है। उसी से लय या प्रलय होता है और उसी में संपूर्ण सृष्टि का लय होता है। दुभार्ग्य से लिंग शब्द को कुछ आलोचक नास्तिक अश्लील अर्थो में भी लेते हैं। वास्तव में यह कल्पना परम मूर्खता और अज्ञानता दर्शाती है। वैदिक शब्द का यौगिक अर्थ लेना ही बुद्धिमानी और परम तत्व की प्राप्ति है।

    शिव मन्दिरों में पाषाण-निर्मित शिवलिंग की अपेक्षा बाणलिंग की विशेषता ही अधिक है। अधिकांश उपासक मृण्मय शिवलिंग अथवा बाणलिंग की उपासना करते हैं। गरूपुराण तथा अन्य शास्त्रों में अनेक प्रकार के शिवलिंग निर्माण का विधान है। उसका संक्षिप्त वर्णन भी पाठकों के ज्ञानर्थ लिख रहा हूँ।

1. दो  भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन तथा तीन भाग कुंकुम से 'गंधलिंग' बनाया जाता है। इसकी यथाविधि पूजा करने से शिव-सामुज्यका लाभ मिलता है।

2. विविध सौरभमय पुष्पों से पुष्पलिंग बनता है इसे पृथ्वी के आधिपत्य लाभ के लिए पूजा जाता है ।

3. कषिलवर्ण गाय के गोबर से 'गोशकृलिंग' निर्मित होता है । यह गोबर अधर में ही लिया जाता है । इसके पूजन से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है परन्तु जिसके लिए यह निर्मित किया जाता है उसकी मृत्यु हो जाती है।

4. 'रजोमय लिंग' के पूजन से सरस्वती की कृपा मिलती है व्यक्ति शिव-सामुज्य पाता है।

5. जौ, गेहू ,चावल के आटे से बने लिंग को 'यवगोधूमशालिज लिंग' कहते हैं  । इससे स्त्री, पुत्र तथा श्री सुख की प्राप्ति होती है।

6. आरोग्य लाभ के लिए मिश्री से 'सिताखण्डमय लिंग' का निर्माण किया जाता है ।

7. हरताल, त्रिकटु को लवण में मिलाकर 'लवणज लिंग' बनता है यह उत्तम वशीकरण कारक और सौभाग्य सूचक होता है।

8. 'पार्थिव लिंग' से कार्य की सिद्धि होती है।

9. 'भस्ममय लिंग' सर्वफल प्रदायक माना गया है।

10.     'गुडोत्थ लिंग' प्रीति में बढ़ोत्तरी करता है।

11.     'वंशाकुर निर्मित लिंग' से वंश बढ़ता है।

12.     'केशास्थि लिंग' शत्रुओं का शमन करता है।

13.     'दुग्धोद्रव लिंग' से कीर्ति, लक्ष्मी और सुख प्राप्त होता है।

14.     'धात्रीफल लिंग' मुक्ति लाभ तथा नवनीत निर्मित लिंग कीर्ति तथा स्वास्थ्य प्रदायक है।

15.     'स्वर्णमय लिंग' से महामुक्ति तथा 'रजत लिंग' से विभूति मिलती है।

16.     कास्य और पीतल के लिंग सामान्य मोक्ष कारक है।

17.     सीसकादि से शत्रुनाथ और 'अष्टधातु लिंग' से सर्वसिद्धि मिलती है।

18.     पारद शिवलिंग महान ऐश्वर्य प्रदायक माना गया है।

लिंग साधारणतया अंगुष्ठ प्रमाण का बनाना चाहिए। पाषाणादि लिंग मोटे और बड़े बनते हैं। लिंग से दुगुनी वेदी और उसका आधा योनिपीठ करने का विधान है। लिंग की लम्बाई उचित प्रमाण में न होने से शत्रु वृद्धि होती है । योनिपीठ बिना या मस्तकादि अंग बिना लिंग बनाना अशुभ है। पार्थिक लिंग अपने अंगूठे के एक पोर बराबर बनाना चाहिए इसको निर्मित करने का विशेष नियम-आचरण है जिसके अभाव में वांछित फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।

    लिंगर्चन में बाणलिंग का अपना अलग ही महत्त्व है। वह हर प्रकार से शुभ, सौम्य सुलक्षण और श्रेयस्कर है। प्रतिष्ठा में भी पाषाण की अपेक्षा बाणलिंग स्थापन सरल-सुगम है। नर्मदा नदी के सभी कंकर शंकर माने गए हैं। इन्हें नर्मेदेश्वर भी कहते हैं। उनमें मनोरम मूर्ति लेकर चावलों से परख देखें। तीन बार तौलने पर भी यदि चावल बढ़ते रहें तो वह नर्मेदेश्वर वृद्धिकारक होगा। नर्मदा में आधा तोला से लेकर मनो तक के कंकर मिलते हैं। यह सब स्वतः प्राप्त और स्वतः संघटित होते हैं। उनमें कई लिंग तो बड़े ही अद्भुत, मनोहर ,विलक्षण और सुन्दर होते हैं। उनके पूजन-अर्चन से महाफल की  प्राप्ति होती है। मिट्टी आदि से पाषाण या नर्मदा की जिस किसी मूर्ति का पूजन करना है उसकी विधि पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा, स्थापन आदि की विधियाँ अनेक ग्रंथों में वर्णित हैं। पूजन-आराधन के यम-नियम समझकर आगे बढ़ने में ही बौद्विकता है। प्रयोग से पहले उनको देखकर समझ लेना इसलिए अति आवश्यक है।

 

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