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Thanks to Shri Gopal raju ji. My Mrs has got a job in Delhi University in July, 2015. His puja and anusthan.
*Ashwarya Dobhal, Delhi
मान्यवर महोदय चरण स्पर्श । मैं बहुत ही गरीब इंसान हूँ । आपके बताये मार्ग पर चलकर अपने अच्छे से जीविका चल रहा हूँ । आप पर पूरा विश्वास है कि आप मेरे लिए और भी अच्छा करेंगे । आपकी कृपा से मेरी किताब भी छापकर आ गयी है । ये मैंने आपको ही समर्पित की है । यह आपकी कृपा का ही फल है । मेरी दूसरी किताब भी आने वाली है । यह भी आपको ही समर्पित है ।
*भीखा राम, डीरा, जोधपुर
Dr. Gopal Raju Jee is regularly doing anusthan for our family. My son, daughter and husband have getting positive results for the last five years.
*Dr. Manju Singh, Haridwar (UK)
Your astrological guidance has turned our life. Like previous days our family is leading now good time.
*Garima Sharma, Roorkee
Interested and logical approach to astrology with modern outlook. I appreciate Gopal ji for his dedication towards the subject for human welfare. Regards,
*Vipin Gaindhar, Melbourne, Australia
After adopting your puja, yantra and gemstones, I have got a favorable job.
*Surendra Singh, Nagpur
गोपाल भाई साहब से मिलकर और उनके द्वारा बताये गए पूजा-पाठ और अनुष्ठान से मेरा जीवन ही बदल गया । कहाँ मुझे क़र्ज़ और मानसिक तनाव से बिलकुल ही तोड़ दिया था और उसके बाद से मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया । सब श्रेय भाई साहब को है । यहाँ रूस आकर मेरे सब कस्ट दूर हो गए हैं । सब क़र्ज़ दूर हो गए फरीदाबाद में एक बहुत ही अच्छा घर ले लिया । सब तरफ से प्रभु ने दिया है अब ।
*बलदेव, मॉस्को



मंत्र सिद्धि के आवश्यक कारक

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मानसश्री गोपाल राजू

रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)

www.bestqastrologer4u.blogspot.com

 

                मंत्र सिद्धि के आवश्यक कारक

    मंत्र सिद्धि अपने में एक जटिल एवं क्लिष्ट प्रकिया हैं। इसके लिए ज्ञान और ज्ञान प्राप्त करने के लिए संयम, इच्छाशक्ति तथा लगन परम आवश्यक है। किसी भी मंत्र क्रिया में यदि जा रहे है तो उसके लिए कुछ कारकों का ज्ञान परम आवश्यक है। पाठकों के लाभार्थ कुछ वह कारक दिये जा रहे हैं जो मंत्र शक्ति के पीछे मंत्र को चैतन्य करने का प्रमुख कार्य करते हैं।

1. ऋषि

    शिव के मुख से उच्चारित सर्वप्रथम जिस महापुरूष ने उसको मंत्र स्वरूप सिद्ध किया था, वह उस मंत्र के ऋषि हैं। उनको आदि गुरू मानकर सर्वप्रथम साधक मस्तक में उनका न्यास करते हैं

2. देवता

    आत्मा के समस्त क्रिया कलापों को  प्रेरित, संचालित तथा नियंत्रित करने वाली प्राणशक्ति को देवता कहते हैं। जप से पूर्व हृदय में देवता का न्यास किया जाता हैं।

3. छन्द

    अक्षर अथवा पदों से छन्द बनता है। इसका उच्चारण मुँह से होता है अतः छन्द का न्यास साधक मुख से करते हैं ।

4. बीज

    जो तत्त्व मंत्रशक्ति को उद्भावित करता है वह बीज कहलाता है । अतः सृजनांग अर्थात गुप्तांग में बीज का न्यास किया जाता है ।

5. शक्ति

    जिस तत्त्व की सहायता से मंत्र बीज बनता है वह शक्ति कहलाता है। मंत्र की उस शक्ति को साधक पादस्थान में न्यास करते हैं।

  6. विनियोग

    किसी मंत्र को उसके फल की दिशा निर्देश देना विनियोग कहलाता है। विनियोग में एक कीलक नामक अन्य तत्त्व भी माना गया है जिसका समस्त अंगों में न्यास किया जाता है। विनियोग मंत्र शक्ति को सन्तुलित रखने के लिए आवश्यक है अन्यथा मंत्र का प्रभाव पूर्ण नहीं होता।

  7. न्यास

    मंत्रमहोदधि में विभिन्न प्रकार के न्यासों का विस्तृत वर्णन मिलता है। न्यास के बिना मंत्र जप निष्फल ही रहता है।

  8. अंगन्यास

    मंत्र-तंत्र के अनेक मूल ग्रंथों में लिखा है कि न्यास के बिना मंत्र अधूरा है वह पूर्णरूप से फल नहीं देता। अज्ञानता अथवा आलस्यवश जो साधक न्यास पूर्ण नहीं करते उन्हें अनेक विघ्नों का सामना करना पड़ता है । इसी क्रम में हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र तथा करतल इन छः अंगों में मंत्र का न्यास करना अंगन्यास कहलाता है।

  9. पंचाग एवं षडंगन्यास

    जहाँ पंचांग न्यास आता है। उसका अर्थ है कि नेत्रों को छोड़कर अन्य पाँच में साधक को न्यास करना चाहिए।

    यदि मंत्र दीक्षा एवं पुरश्चरण विधिवत् नहीं किया गया है तो मंत्र की सिद्धि नहीं होती । ऐसे में पुनः पुरश्चरण करना चाहिए। यदि तीन बार पुरश्चरण करने के बाद भी मंत्र सिद्ध नहीं होता है उसके लिए शास्त्रों में निम्न सात उपाय बताए गए हैं। इसके बाद सिद्धि मिलने में संशय नहीं रहता। सात में से भी कौन सा उपाय अपने लिए चुनें, यह भी योग्य गुरू द्वारा ही जाना जा सकता है अन्यथा कुछ करना व्यर्थ होगा।

1. भ्रामण

    शिलारस, कपूर, कुंकुम, खस तथा सफेद चन्दन के तेल को मिलाकर एक वायु बीज 'यं' तथा एक मंत्र के अक्षर को लिखें। इस प्रकार 'यं'  बीज से सम्पुटित कर मंत्र का एक-एक अक्षर भोजपत्र पर अपने मंत्र को यंत्राकार से लिखें। इस लिखित मंत्र को दूध, घी, मधु तथा जल छोड़कर विधिवत् पूजन, जप तथा हवन करें। इस प्रकार पुरश्चरण करने से मंत्र की सिद्धि अवश्य ही मिलती है।

2. रोधन

    '' से सम्पुटित मूल मंत्र का जप रोधन कहलाता है। सिद्धि में इसका भी महत्त्वपूर्ण योगदान है।

3. वशीकरण

    अपने मंत्र को रक्तचन्दन, कूट, धतूरे के बीज तथा मैंनसिल से लिखकर गले में धारण करके फिर जप करना वशीकरण कहलाता है ।

4. पीड़न

    अधरोत्तर योग से जप करके अधरोत्तर  स्वरूपणी देवता की पूजा करके अकवन के दूध से विल्वपत्र पर मंत्र लिखकर उसे पाँव के नीचे दबाकर हवन करने को पीड़न कहते हैं।

5. पोषण

    स्त्री बीज से सम्पुटित कर मंत्र का एक हजार जप करना तथा मंत्र को गाय के दूध से भोजपत्र पर लिखकर हाथ में धारण करना पोषण कहलाता है।

6. शोषण

    'यं' बीज से सम्पुटित मूल मंत्र का एक हजार जप तथा यज्ञ भस्म से मूल मंत्र को भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करना शोषण कहलाता है।

7. दाहन

    मंत्र के प्रत्येक स्वर वर्ण के साथ 'रं' लगाकर जप करना तथा पलाश के तेल से भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करना दाहन कहलाता है।

 


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