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*Ruchi Mehra, Banglore
बज़रिए ऑरकुट मुझे श्रद्धेय गुरु जी से मिलने का सौभाग्य मिला । आपसे विचार-विनमय के जितने भी संयोग घटित हुए प्रायः उन सबमें मैंने स्वयं को उज्व्र्वस्वित पाया । आपमें सदैव मुझे एक विशिष्ट दैवीय आभा दिखी है । समय समय पर मैं उनसे लाभान्वित होता रहा हूँ । ईश्वर से प्रार्थना है की वे उन्हें शतायु करें जिससे जनकल्याण के मिशन का लाभ सबको मिलता रहे ।
*डॉ. आशुतोष, बनारस
गोपाल राजू मेरे छोटे भाई की तरह है | भारतीय वांग्मय से जो साहित्य सुधि पाठकों को वह दे रहें हैं, अपने में वह एक मिसाल है | राजू भाई के उज्जवल भविष्य की मैं कामना करता हूँ |
*राधा कृष्ण श्रीमाली, जोधपुर
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*Harmohan Kumar
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*Jai Krishan Sharma, Jodhpur



विवाह कितने प्रकार के होते हैं

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मानसश्री गोपाल राजू

      हिन्दु धर्म में सोलह संस्कारों का विशेष महत्व है। जीव की सम्पूर्ण जीवन यात्रा में ऋषि-मुनियों ने उसे अच्छे संस्कारों से संस्कारित करने के लिए उसके जन्म के पूर्व से ही अलग-अलग नियम बनाए जिससे कि वह एक आदर्श और मर्यादा पूर्ण जीवन व्यतीत करें। व्यक्ति की पहचान वस्तुतः उसके सस्कारों से ही होती है। जीवन को सुन्दर बनाने के लिए समाज में अधिकांशतः सोलह संस्कारों को ही मान्य माना गया है। यह सोलह संस्कार हैं - गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमान्तोनयन संस्कार, जातकर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, चूड़ाकरण संस्कार, कर्मवेध संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह संस्कार, केशान्त संस्कार, वेदारम्भ संस्कार, विवाहाग्नि परिग्रह संस्कार, और अन्योष्टि संस्कार।

    जीवन की यात्रा में वंशवृद्धि के लिए तथा पूर्णतः अर्थात् मुक्ति के लिए विवाह को एक आवश्यक संस्कार माना गया है। शास्त्रों में विवाह के कुल आठ प्रकार बताए गए हैं-

1. ब्रह्म विवाह - इस विवाह में पहले योग्य गुणवान, ज्ञानवान और शारीरिक रूप से बलवान वर की तलाश की जाती है। इसके बाद कन्या पक्ष के परिजन कन्या पक्ष से विवाह का अनुग्रह करते हैं। दोनों पक्ष में परस्पर सहमति के पश्चात् कन्या को वस्त्र-आभूषण से सजाकर विधि-विधान से कन्या दान कर पति के साथ विदा किया जाता है।

2. प्रजापत्य विवाह - इस प्रकार के विवाह में वर और वधु दोनों सहधर्म का पालन करने की प्रतीज्ञा करते हुए विवाह वचन को स्वीकार करते हैं। गृहस्थ धर्म का पालन करने के शुभाशीर्वाद के बाद कन्या के माता-पिता उसको विदा करते हैं। 

3. आर्ष विवाह - वर पक्ष से गऊ का जोड़ा लेकर कन्यादान करना आर्ष विवाह कहलाता है।

4. दैव विवाह - विवाह की वेदी में बैठकर ऋत्विक को जो कन्यादान किया जाता है उसको दैव विवाह कहते हैं। इस विवाह में भी वरपक्ष की सहमति के पश्चात् वैदिक परम्परा से संस्कार करके तथा अन्य अलंकरण के साथ कन्या को विदा किया जाता है।

5. गान्धर्व विवाह - कन्या और वर की परस्पर सहमति के पश्चात् जो विवाह होता है वह गान्धर्व विवाह कहलाता है। वर्तमान में देखा जाएं तो प्रेम विवाह इस प्रकार के विवाह का ही एक परिवर्तित स्वरूप है। प्रचीन काल में इस प्रकार का विवाह का एक स्वरूप स्वयंवर भी कहा जाता था ।

6. आसुरी विवाह - कन्या के माता-पिता को धन आदि का प्रलोभन देकर जो विवाह किया जाता है वह आसुरी विवाह कहलाता है। इसमें एक प्रकार से कन्या को धन देकर क्रय करना कहा जा सकता है।

7. राक्षस विवाह - बलपूर्वक, डरा-धमकाकर बलात् जो विवाह किया जाता है उसे राक्षस विवाह कहते हैं। इस विवाह में वर पक्ष द्वारा छल, कपट, बाहुबल और अपने दबदबे का प्रयोग करते हुए एक प्रकार से कन्या का अपहरण करना भी आ जाता है।

8. पैशाच विवाह - कन्या को मदहोश करके अथवा सोती हुई अवस्था में हरण करके उससे बलात् विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है। अचेतन अवस्था में उससे सम्बन्ध बनाकर उसका अपहरण करना, बलात्कार करके उसकी इच्छा के विरूद्ध उसका अपहरण आदि करना सब पैशाच विवाह की श्रेणी में आते हैं।

    उक्त आठ प्रकार के विवाह में पहले चार को ही धर्मानुकूल बताया गया हैं। अन्य चार अन्तः के विवाह समाजिक अथवा धार्मिक रूप से किसी भी समाज के द्वारा मान्य नहीं है और इसलिए स्वीकार भी नहीं किये जाते है।

 

मानसश्री गोपाल राजू

 


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